Wednesday, 8 March 2017

"निर्मोही"

"निर्मोही"

तुम्हारे आभा पे बिंदी बहूत खिलता है ....
वाकय तुम् खूबसूरत लगती हो ....
जब हँसती हो ...मचलती हो ..!!

पता नहीं क्यों ....?

मेरा ध्यान बार-बार...
तुम्हारी ओर आकर्षित होता है ...

सौंदर्य किसी को भी आकर्षित कर सकता है !
ये सच है .....
पर तुम् ही क्यों .......???

पता नहीं क्यों.....
तुझे अन्तर्मन् से देखता हूँ !

ये जानते हुए भी ....!!

की तुम् निर्मोही हो ....
की तुम निर्मोही हो ...

रजनिश प्रियदर्शी 
  22/10/2016

"रूप"

"रूप"

उत्श्रृंखलता विशेष् 
परन्तु जो सत्य है 
कहे देता हूँ ...
अनुपम, अद्भुत 
युवचित हारी ...
मृगनयन, 
मृदुल भाषी ...
लज्या छोड़
सभी गुणों  से 
लवलेश हो ...
शायद इसीलिए 
मेरे लिए .....
तुम् विशेष् हो ..।।

© रजनिश प्रियदर्शी
     04/09/2016

"वासुदेव कृष्ण"

"वासुदेव कृष्ण"

अवतार लियो लीला रच्यौ 
सम्पूर्ण जगत लयबद्ध कियौ ।।

वसुदैव् पुत्र नन्दलाल भयौ 
कोउ जन्म दियौ , कोउ मातु भयौ ।।

कंस विध्वंस कियो प्रभु तुम् 
मथुरा जन को भय मुक्त कियो ।।

प्रभु प्रेम विरह सम रास रच्यौ 
राधा, रुक्मिन, मीरा,,,,,,,
सब तोहे रंग में रंग गयौ
प्रभु तोहे रंग में रंग गयौ ।।

गीता सन ग्रन्थ वच्यौ प्रभु तुम् 
सम्पूर्ण जगत को ज्ञान  दियौ ।।

अवतार लियो लीला रच्यौ 
सम्पूर्ण जगत लयबद्ध कियौ ।।

© रजनिश प्रियदर्शी
   जन्मआष्ट्मी दिन
         2016

डॉ सर्वपल्ली राधाकृष्णन ।

डॉ सर्वपल्ली राधाकृष्णन ।

सर्वतोमुखी, प्रतिभस्मप्पन्न
डॉ सर्वपल्ली राधाकृष्णन ।

तिरुतनी के सम्भ्रांत ब्राह्मण परिवार से
सरल, निश्छल स्वभाव से
अध्ययन में रूचि थी बाल्यकाल से ।

भारतीय संस्कृति के उन्नायक
दार्शनिक, तत्ववेत्ता, शिक्षाशास्त्री
व् कुशल अध्यापक ....।

दर्शनशास्त्र के ज्ञाता
महान् व्यख्यानकर्ता
राष्ट्र निर्माता शिक्षकों के प्रति कृत्यज्ञ थे ।
भारत के प्रकाश पुंज राधाकृष्णन
एक प्रेरक आयाम थे ।।

कुलाधिपति, राजदूत, उपराष्ट्रपति
राष्ट्रपति के पद पर प्रतिष्ठत हुए ।
सरवोच्च नागरिक सम्मान
भारतरत्न से विभूषित हुए ।।

राष्ट्र के प्रति समर्पण
निष्ठा के भाव से
अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर दिलाये
भारत को सम्मान ।
देखा करते थे स्वप्प्न
भारत ले विश्वगुरु का स्थान ।।

ऐसे महान् आत्मा के जन्म दिवस पर
सम्पूर्ण विश्व के गुरुजनों को
राजनिश प्रियदर्शी का
कोटि कोटि प्रणाम !!!

© राजनिश प्रियदर्शी
     05/09/2016

हिंदी कविता "सिद्धांत"

"सिद्धान्त"

मनुष्य ....
सर्वज्ञ हो सुविज्ञ हो 
सुश्रव्य, सुविनित और
विश्रब्ध होना चाहिए ।

सार्वभौमिक् सत्य ...
एवं साकल्य ...
ह्रदयंगम हो ऐसा 
प्रतिमान होना चाहिए ।

विवेक सह विज्ञान के 
समदृष्टि से ....
स्व से शाश्वत सत्य में
प्रविष्ठ हो जाएँ ऐसा...
सिद्धान्त होना चाहिए ।।

©रजनिश प्रियदर्शी 
   06/12/2016

हिंदी कविता "द्वन्दवाद"

"द्वन्दवाद"

वाद-प्रतिवाद-संवाद के
त्रिकोणीय सम्बंध से 
निकलता है द्वन्दवाद ।।

हीगेल, मार्क्स जैसे ...
बौद्धिक महान् विचारकों के 
दुर्बोध तर्क एवं सिद्धान्तों ...
का आधार है द्वन्दवाद ।।

समकालीन, कालांतरीय
धारणाओं के अन्वेषण 
का द्योउत्क है द्वन्दवाद ।।

वाद-प्रतिवाद-संवाद.....।2।

© राजनिश प्रियदर्शी
      12/09/2016

हिंदी कविता "तुम्हारी सभ्यता"

"तुम्हारी सभ्यता"

ऐ हिन्द तेरी सभ्यता क्या है ? ज़रा चिंतन करो
करते हो किसका अनुसरण, निज तर्क से मंथन करो ।।

आज तुम् पथभ्रष्ट हो , पाश्चात्य में ढलने लगे
विभत्स, पाश्विक सभ्यता, का अनुसरण करने लगे ।।

तुम् सूरा और सुंदरी, में अधिक रमने लगे
निज सभ्यता की अस्मिता पर, प्रश्न चिंन्ह बनने लगे ।।

सुनामा (नारी) के नए परिधान के, हर दृश्य से विक्षुबब्ध हूँ
अपनी विभुषित सभ्यता, के त्यजन  से निश्बद्ध हूँ ।।

अपना सुयश इतिहास है, और सभ्यता इतनी बड़ी
इस निखिल संसार में,  हम शांति के पर्याय हैं ।।

ऐ हिन्द तेरी सभ्यता क्या है ? ज़रा चिंतन करो
करते हो किसका अनुसरण, निज तर्क से मंथन करो ।2।

© राजनिश प्रियदर्शी
      27/09/2016